नशा
सामाजिक वैषम्य पर प्रहार करती कहानीप्रेमचंद की कहानियां सामाजिक विसंगतियों को परत दर परत उघाड़ती चलती हैं। यथार्थ की भूमि पर टिकी कथावस्तु विभिन्न पात्रों के माध्यम से वांछित उत्कर्ष की ओर अग्रसर होती हैं। कहीं भावावेग तथा कहीं घटना की विलक्षणता कथानक को मोड़ देती है। और कहीं संवादों में आविष्ट विचार तन्तु को खोलने में सक्षम होते हैं। प्रेमचंद आस्थावादी कहानीकार हैं परन्तु किन्हीं कहानियों में वे अपने पात्रों को निर्मम यथार्थ की कठोर भूमि पर भी ला पटकते हैं।
‘नशा’ कहानी में लेखक का चिन्तक एवं विचारक सजग है। यही कारण है कि कहानी का ताना-बाना सुनियोजित एवं सुगठित लगता है। कहानी वस्तुत: ईश्वरी एवं बीर, दो मित्रों के वैचारिक टकराव से शुरू होती है तथा अन्त तक पहुंचते-पहुंचते मोहभंग को प्रदर्शित करती है। जमींदार का बेटा ईश्वरी तथा एक गरीब क्लर्क का पुत्र बीर। दोनों प्रयाग में पढ़ते हैं। दोनों में खूब छनती है। सुख-सुविधा एवं संपन्नता में पला ईश्वरी तर्क करता है कि समाज की पांचों उंगलियां कभी एक समान नहीं हो सकतीं। अमीर और गरीब का भेद सदा बना रहा है तथा बना रहेगा। बीर जमींदारों को शोषक कहकर उनकी तुलना जोंक से करता है, जो परजीवी बनी रहती है।
दशहरे की छुटि्टयों में बीर ईश्वरी के आमंत्रण पर उसके साथ गांव चला गया। अपने घर जाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। ईश्वरी ने उसे समझाया कि वह उसके घर जाकर जमींदारों की निंदा न करे। वे दोनों सेकण्ड क्लास रेलगाड़ी में गये। मुरादाबाद पहुंचे तो स्टेशन पर रियासत अली और रामहरख ईश्वरी के स्वागत के लिए खड़े थे। साथ पांच बेगार भी आए थे। ईश्वरी मित्र का परिचय एक रईस पुत्र के रूप में करवाता है और सादगी का कारण इस प्रकार बताता है–‘‘महात्मा गांधी के भक्त हैं साहब। खद्दर के सिवा कुछ पहनते ही नहीं। पुराने सारे कपड़े जला डाले। यों कहो कि राजा हैं। ढाई लाख सालाना की रियासत है, पर आपकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर आये हैं।’’ वह अपने मित्र की गरीबी पर लीपापोती करके उसे बड़ा दिखाता है। पहले तो बीर को यह सब सुनने में संकोच होता है परन्तु उसके घर पहुंचकर वह ईश्वरी जैसा ही व्यवहार करने लगता है। कहार ईश्वरी के पांव धोता है, तो वह भी अपने पांव आगे कर देता है। इसी प्रकार कुंवर मेहमान अपने हाथ से बिस्तर कैसे बिछाए। ईश्वरी अपनी माता से बात कर रहा था दूसरे कमरे में। रात के दस बजे नौकर को बिस्तर लगाने की सुधि आई। बीर तो रईसों की तरह बिफर पड़ा।
एक और घटना का जिक्र है। बीर लैम्प भी खुद क्यों जलाए, यह तो बड़े लोगों को अच्छा नहीं लगता। उसने रियासत अली को फटकार लगा दी और कहा–‘‘तुम लोगों को इतनी भी फिक्र नहीं कि लैम्प तो जला दो। मालूम नहीं यहां कामचोर आदमियों का कैसे गुजर होता है। मेरे यहां घंटे भर निर्वाह न हो।’’ वस्तुत: वह पराए रईसी ठाठ-बाट की चकाचौंध में, नशे में तैरने लगा था।
महात्मा गांधी के परम भक्त ठाकुर से भी वह झूठ बोलता है और उसे भविष्य में ड्राइवरी सिखाकर अपने पास रखने की डींग मारता है। इसी प्रसंग में दोनों सुराज की बात भी करते हैं। ठाकुर पूछता है–‘‘लोग कहते हैं यहां सुराज हो जायेगा तो जमींदार नहीं रहेंगे।’’
बीर अपनी पुरानी धुन में फूट पड़ा–‘‘जमींदारों के रहने की जरूरत ही क्या है, यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्या करते हैं?’’
बीर की शरण मिलने का आश्वासन पाकर ठाकुर तरंग में आ गया। भांग पीकर उसने अपनी पत्नी को पीटा तथा महाजन से लड़ने को भी तैयार हो गया।
छुटि्टयां समाप्त हो गईं। रेलयात्रा के लिए वापसी का टिकट तो था परन्तु भीड़ बहुत होने के कारण उन्हें तीसरे दर्जे के डिब्बे में ही चढ़ना पड़ा। बुरा हाल था। बीर को फंसे फंसे जाना अब अखर रहा था। वह दरवाजे़ के पास खड़ी एक सवारी से भिड़ गया और उसे तमाचे जड़ दिये। सवारी घबराई लेकिन दूसरे लोगों ने बीर को दबोच लिया और धुनाई कर दी। उसका सारा नशा काफूर हो गया। ईश्वरी ने भी उसे अंग्रेजी में इडियट कहकर दुत्कारा।
अब तक सत्ता के नशे पर सवार आसमान में उड़ रहा बीर एकाएक पृथ्वी पर आ गिरा... उसे अपनी औकात का भान हो गया था।
कथानक एकदम सुविचारित एवं संगठित है तथा व्यवहार में परिवेशगत परिवर्तन के थपेड़े खाकर आगे बढ़ता है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण:–कहानी में मुख्य पात्र दो ही हैं–ईश्वरी तथा बीर। इन दो पात्रों के अतिरिक्त कुछ पात्र क्षणभर के लिए उपस्थितहोते हैं। परन्तु अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। रियासत अली और रामहरख ऐसे ही पात्र हैं। उन्हें प्रथम दर्शन की बीर पर रईसी पर विश्वास नहीं होता परन्तु सारी बात को ईश्वरी संभालता है। एक अन्य पात्र ठाकुर भी बड़ा प्रभावशाली है। सुराज की चर्चा से वह अपने असंतोष को व्यक्त करता है तथा उस युग की प्रतीक्षा लगाए बैठा है, जब भूमि का आबंटन गरीब-अमीर में समान रूप से हो जाएगा।
बीर का चरित्र मनोवैज्ञानिकता से सम्पृक्त है। साधनहीन व्यक्ति को जब कोई बड़प्पन दर्शाने, वह छद्म ही क्यों न हो, का अवसर मिलता है, तो वह उसी में धंसता चला जाता है। उसे पुन: चेतना तब प्राप्त होती है जब वह यथार्थ की भूमि पर पटक दिया जाता है। यह उसके मोहपाश में फंसने की कहानी भी है तथा साथ ही अंत में अपनी औकात में लौटने का सच भी। यह निर्धन की नियति, ललक एवं फटकार की श्रेष्ठ रचना है। ईश्वरी का चरित्र तो एक पारम्परिक रईस का खाका है, जो अपने वर्ग को दैवी अधिकार का हकदार मानता है तथा सामाजिक विषमता को एक स्वाभाविक एवं परमावश्यक सत्य स्वीकार करता है।
संवाद:–‘नशा’ कहानी के संवाद बड़े चुटीले एवं अर्थ-गर्भित हैं। साधारण से साधारण पात्र भी सटीक संभाषण में तल्लीन दृष्टिगत होता है। यथा–ठाकुर ने फिर पूछा–तो खुशी से दे देगें। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी ज़मीन छीननी ही पड़ेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं।
शब्दों में ठाकुर की लार सहज ही टपकती दिखाई पड़ती है। यहीं संवादों की सार्थकता है। संक्षिप्त होते हुए भी ये चुटीले हैं।
कहानी बीर के माध्यम से आत्म-कथ्य में लिखी गई है, इसलिए नायक का मनन एवं चिंतन व्यवहार एवं वास्तविकता उसके संवादों से ही टपकती है।
भाषा:–पात्रों के अनुकूल है। कहीं कहीं उर्दू के शब्दों का प्रयोग मिलता है, जो रियासत अली जैसे पात्र के मुंह में सटीक लगता है और कहीं-कहीं लेखक की अप्रत्यक्ष टिप्पणी से नि:सृत जान पड़ता है। गुस्से में आकर ईश्वरी अंग्रेजी के एक वाक्य का भी प्रयोग करता है–बीर को डांटने के लिए, उसे स्थिति की भयावहता से परिचित करवाने के लिए।
कहानी की शैली सपाट न होकर दृष्टांत की है। पहले से अमीर-गरीब की खाई का विचार लेखक के मन में है। इसी के प्रतिपादन के लिए स्थितियों का चयन किया गया है, जिसमें फंसकर नायक पुन: अपनी औकात को पहचानता है। शैली की रोचकता ने कहानी के तथ्य को बल प्रदान किया है।
प्रेमचंद की सभी कहानियां सोद्देश्य हैं। उनका उद्देश्य समाज की विसंगतियों को उखाड़कर आस्थावादी संदेश देना होता है। झूठ एवं छद्म के मोहपाश में फंसकर वास्तविकताओं को भूलना जीवन में त्रासद स्थितियों को उत्पन्न करता है। बीर अपने ही जाल में फंसता चला जाता है। पहले उसे संकोच होता था। एक गरीब क्लर्क का बेटा पैसे के बल पर किसी को नाच नहीं नचा सकता। परन्तु ईश्वरी के वैभव के कंधे पर चढ़कर उस पर नशा छाने लगा। नौकरों को ईश्वरी के अंदाज में डांटना उसे सुहावना लगा। रेलवे कैंटीन में खानसामों का उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखना बेहद बुरा लगा। ईश्वरी की संगत में उसकी भी इच्छा होती है कि उसके साथ रईसों सा व्यवहार हो परन्तु यह तो मिथ्या आकांक्षा थी। यही कारण है कि अन्त में वह गरीब बीर की आत्मा में लौट आता है। उसका नशा काफ़ूर हो जाता है।
लेखक ने सामाजिक वैषम्य पर प्रहार तो किया है परन्तु कहानी का चरम उत्कर्ष इस बात की ओर भी संकेत करता है कि इस खाई को पाटना इतना सहज एवं सरल नहीं। शताब्दियों से खड़ी हुई धनवान एवं निर्धन की दीवारें अभेद्य हैं। कभी सुराज के माध्यम से लेखक यह कहना चाहता है कि संभव है समान बंटवारे का समय आए। महात्मा गांधी का सपना साकार हो लेकिन अभी देश और काल की स्थितियां परिपक्व नहीं... उनमें परिवर्तन में अभी समय लगेगा।
इस प्रकार यह कहानी आदर्श की ओर अग्रसर होने के लिए लालायित होती हुई भी मोहभंग की कहानी बन गई। तंद्रा में बीर स्वप्न देखता रहा, क्षणभर के लिए ईश्वरी के घर में सुख-सुविधाएं भोगता रहा परंतु कब तक। वह मोहपाश से बाहर आते ही बिफर जाता है। यह निर्मम यथार्थ की सशक्त कहानी बन गई है... केवल कल्पना से ही कुछ प्राप्त नहीं होगा... अभी संघर्ष की यातना बाकी है। प्रेमचंद कहानी की चरम परिणति को प्रश्न चिह्न की स्थिति में लाकर खुला छोड़ देते हैं। इससे कहानी का अर्थ-गाम्भीर्य और भी बढ़ गया तथा यह कहानी कलात्मकता से परिपूर्ण हो गई है।






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