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Friday, 24 April 2020

ब्लॉग क्या हैं ?

ब्लॉग जिसे वेब लॉग भी कहते है, इंटरनेट पर कोई नई बात नहीं है। यह एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म है जिसकी सहायता से आप मनचाहे विषय पर अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल जर्नलिंग, प्रमोशन, राइटिंग और पब्लिशिंग के लिए किया जा रहा  है। यदि आप एक ब्लॉग शुरू करना चाहते हैं, तो कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं जिन्हें आपको जानना चाहिए।

शुरूआती दिनों में लोग ब्लॉग को एक डायरी के रूप में इस्तेमाल करते थे, और इन ब्लॉगों का उपयोग केवल इस उद्देश्य के लिए किया जाता था ताकि लोग अपने विचारों को व्यक्त कर सके । अब एक ब्लॉग के माध्यम से आप अनगिनित लोगों को किसी प्रकार की इनफार्मेशन दे सकते हैं, शिक्षित कर सकते हैं, किसी उत्पाद का प्रमोशन कर सकते हैं , और एक ब्लॉग आपको उत्पाद बेचने में मदद भी कर सकता है।  ब्लॉगिंग के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि ब्लॉगिंग पैसिव इनकम  का एक जरिया  भी  सकता है। हैं न मजे की बात।


यदि आपके पास  ब्लॉग नहीं है, तो भी आप आसानी से इसे शुरू सकते है।  बहुत ज्यादा तकनिकी ज्ञान की आव्यशकता नहीं हैं इसमें। एक ब्लॉगर के रूप में सफल होने के लिए वास्तव में सिर्फ एक आवश्यकता है: अपने विषय के लिए जुनून।

किसी ऐसे विषय को चुनना, जिसमें आप उत्साह रखते हैं, एक सफल ब्लॉग शुरू करने की प्रक्रिया को आसान बना देता है। एक से अधिक विषयों के बारे में लिखना तब तक ठीक हैं जब तक आप उन विषयों  के बारे में लिख रहे हैं, जिनमें आप वास्तव में रुचि रखते हैं।  यदि ऐसा हैं तो आपकी मेहनत रंग लायेगी एवं आपके पाठकों को आपके ब्लॉग में दिलचस्पी रहेगी ।

ब्लॉग के  फायदे  -

घर से पैसा कमाओ:  अगर सही ढंग से किया जाए तो ब्लॉगिंग काफी आकर्षक हो सकती है। दुनिया के शीर्ष ब्लॉगर्स स्पष्ट रूप से काफी कमाते हैं, एवं एक पार्ट टाइम ब्लॉगर भी अच्छा लाभ कमाने की उम्मीद रख सकता है यदि चीजें सही तरीके से की जाती हैं। इसके बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि ब्लॉगिंग पैसिव इनकम  का एक जरिया  है, क्योंकि आप ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिए सप्ताह में सिर्फ कुछ घंटे बिताते  हैं और फिर ब्लॉग पोस्ट लिखे जाने के बाद भी इससे पैसे कमाते रहते हैं। 


अपने  विचार साझा करें : एक ब्लॉग के माध्यम से पूरी दुनिया के साथ आप अपने विचार साझा कर सकते हैं।यदि आप ऐसा चाहते हैं तो ब्लॉग का उपयोग एक डायरी के रूप में भी होता हैं, जहां ब्लॉगर अपने दैनिक अनुभवों के बारे में लिखते हैं ताकि दोस्तों, परिवार, और अन्य सभी अपने जीवन का हिस्सा बन सकें। आपने ज़्यादातर लीडिंग पर्सनॅलिटीज़ के ब्लॉगस तो  देखें होंगे।   



व्यापार में ब्लॉगिंग : हर व्यापार में ग्राहक होते है, एवं अगर आप एक सफल व्यापारी हैं तो आप जानते हैं कि सफलता की कुंजी नए और अलग अलग ग्राहकों तक पहुंचने में हैं। नएलोगों तक पहुंचने के लिए, एक ब्लॉग शुरू करना सबसे शानदार तरीका है,। किसी ब्लॉग को अधिक से अधिक लोगो में पहुंचाने के लिए आप इसे सोशल मीडिया में 

Thursday, 23 April 2020

mindspark

https://ei-india.com/mindspark-math/

Tuesday, 21 April 2020

नशा : सामाजिक वैषम्‍य पर प्रहार करती कहानी

नशा

सामाजिक वैषम्‍य पर प्रहार करती कहानी
प्रेमचंद की कहानि‍यां सामाजिक विसंगतियों को परत दर परत उघाड़ती चलती हैं। यथार्थ की भूमि पर टिकी कथावस्‍तु विभिन्‍न पात्रों के माध्‍यम से वांछित उत्‍कर्ष की ओर अग्रसर होती हैं। कहीं भावावेग तथा कहीं घटना की विलक्षणता कथानक को मोड़ देती है। और कहीं संवादों में आविष्‍ट विचार तन्‍तु को खोलने में सक्षम होते हैं। प्रेमचंद आस्‍थावादी कहानीकार हैं परन्‍तु कि‍न्‍हीं कहानियों में वे अपने पात्रों को निर्मम यथार्थ की कठोर भूमि पर भी ला पटकते हैं।
‘नशा’ कहानी में लेखक का चिन्‍तक एवं विचारक सजग है। यही कारण है कि कहानी का ताना-बाना सुनि‍योजित एवं सुगठित लगता है। कहानी वस्‍तुत: ईश्‍वरी एवं बीर, दो मित्रों के वैचारिक टकराव से शुरू होती है तथा अन्‍त तक पहुंचते-पहुंचते मोहभंग को प्रदर्शित करती है। जमींदार का बेटा ईश्‍वरी तथा एक गरीब क्‍लर्क का पुत्र बीर। दोनों प्रयाग में पढ़ते हैं। दोनों में खूब छनती है। सुख-सुविधा एवं संपन्‍नता में पला ईश्‍वरी तर्क करता है कि समाज की पांचों उंगलियां कभी एक समान नहीं हो सकतीं। अमीर और गरीब का भेद सदा बना रहा है तथा बना रहेगा। बीर जमींदारों को शोषक कहकर उनकी तुलना जोंक से करता है, जो परजीवी बनी रहती है।
दशहरे की छुटि्टयों में बीर ईश्‍वरी के आमंत्रण पर उसके साथ गांव चला गया। अपने घर जाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। ईश्‍वरी ने उसे समझाया कि वह उसके घर जाकर जमींदारों की निंदा न करे। वे दोनों से‍कण्‍ड क्‍लास रेलगाड़ी में गये। मुरादाबाद पहुंचे तो स्‍टेशन पर रियासत अली और रामहरख ईश्‍वरी के स्‍वागत के लिए खड़े थे। साथ पांच बेगार भी आए थे। ईश्‍वरी मित्र का परिचय एक रईस पुत्र के रूप में करवाता है और सादगी का कारण इस प्रकार बताता है–‘‘महात्‍मा गांधी के भक्‍त हैं साहब। खद्दर के सिवा कुछ पहनते ही नहीं। पुराने सारे कपड़े जला डाले। यों कहो कि राजा हैं। ढाई लाख सालाना की रियासत है, पर आपकी सूरत देखो तो मालूम होता है, अभी अनाथालय से पकड़कर आये हैं।’’ वह अपने मित्र की गरीबी पर लीपापोती करके उसे बड़ा दिखाता है। पहले तो बीर को यह सब सुनने में संकोच होता है परन्‍तु उसके घर पहुंचकर वह ईश्‍वरी जैसा ही व्‍यवहार करने लगता है। कहार ईश्‍वरी के पांव धोता है, तो वह भी अपने पांव आगे कर देता है। इसी प्रकार कुंवर मेहमान अपने हाथ से बिस्‍तर कैसे बिछाए। ईश्‍वरी अपनी माता से बात कर रहा था दूसरे कमरे में। रात के दस बजे नौकर को बिस्‍तर लगाने की सुधि आई। बीर तो रईसों की तरह बिफर पड़ा।
एक और घटना का जिक्र है। बीर लैम्‍प भी खुद क्‍यों जलाए, यह तो बड़े लोगों को अच्‍छा नहीं लगता। उसने रियासत अली को फटकार लगा दी और कहा–‘‘तुम लोगों को इतनी भी फिक्र नहीं कि लैम्‍प तो जला दो। मालूम नहीं यहां कामचोर आदमियों का कैसे गुजर होता है। मेरे यहां घंटे भर निर्वाह न हो।’’ वस्‍तुत: वह पराए रईसी ठाठ-बाट की चकाचौंध में, नशे में तैरने लगा था।
महात्‍मा गांधी के परम भक्‍त ठाकुर से भी वह झूठ बोलता है और उसे भविष्‍य में ड्राइवरी सिखाकर अपने पास रखने की डींग मारता है। इसी प्रसंग में दोनों सुराज की बात भी करते हैं। ठाकुर पूछता है–‘‘लोग कहते हैं यहां सुराज हो जायेगा तो जमींदार नहीं रहेंगे।’’
बीर अपनी पुरानी धुन में फूट पड़ा–‘‘जमींदारों के रहने की जरूरत ही क्‍या है, यह लोग गरीबों का खून चूसने के सिवा और क्‍या करते हैं?’’ 
बीर की शरण मिलने का आश्‍वासन पाकर ठाकुर तरंग में आ गया। भांग पीकर उसने अपनी पत्‍नी को पीटा तथा महाजन से लड़ने को भी तैयार हो गया।
छुटि्टयां समाप्‍त हो गईं। रेलयात्रा के लिए वापसी का टिकट तो था परन्‍तु भीड़ बहुत होने के कारण उन्‍हें तीसरे दर्जे के डिब्‍बे में ही चढ़ना पड़ा। बुरा हाल था। बीर को फंसे फंसे जाना अब अखर रहा था। वह दरवाजे़ के पास खड़ी एक सवारी से भिड़ गया और उसे तमाचे जड़ दिये। सवारी घबराई लेकि‍न दूसरे लोगों ने बीर को दबोच लिया और धुनाई कर दी। उसका सारा नशा काफूर हो गया। ईश्‍वरी ने भी उसे अंग्रेजी में इडियट कहकर दुत्कारा।
अब तक सत्ता के नशे पर सवार आसमान में उड़ रहा बीर एकाएक पृथ्‍वी पर आ गिरा... उसे अपनी औकात का भान हो गया था।
कथानक एकदम सुविचारित एवं संगठित है तथा व्‍यवहार में परिवेशगत परिवर्तन के थपेड़े खाकर आगे बढ़ता है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण:–कहानी में मुख्‍य पात्र दो ही हैं–ईश्‍वरी तथा बीर। इन दो पात्रों के अतिरिक्‍त कुछ पात्र क्षणभर के लिए उपस्थित‍होते हैं। परन्‍तु अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। रियासत अली और रामहरख ऐसे ही पात्र हैं। उन्‍हें प्रथम दर्शन की बीर पर रईसी पर विश्‍वास नहीं होता परन्‍तु सारी बात को ईश्‍वरी संभालता है। एक अन्‍य पात्र ठाकुर भी बड़ा प्रभावशाली है। सुराज की चर्चा से वह अपने असंतोष को व्‍यक्‍त करता है तथा उस युग की प्रतीक्षा लगाए बैठा है, जब भूमि का आबंटन गरीब-अमीर में समान रूप से हो जाएगा।
बीर का चरित्र मनोवैज्ञानिकता से सम्‍पृक्‍त है। साधनहीन व्‍यक्ति को जब कोई बड़प्‍पन दर्शाने, वह छद्म ही क्‍यों न हो, का अवसर मिलता है, तो वह उसी में धंसता चला जाता है। उसे पुन: चेतना तब प्राप्‍त होती है जब वह यथार्थ की भूमि पर पटक दिया जाता है। यह उसके मोहपाश में फंसने की कहानी भी है तथा साथ ही अंत में अपनी औकात में लौटने का सच भी। यह निर्धन की नियति, ललक एवं फटकार की श्रेष्‍ठ रचना है। ईश्‍वरी का चरित्र तो एक पारम्‍परिक रईस का खाका है, जो अपने वर्ग को दैवी अधिकार का हकदार मानता है तथा सामाजिक विषमता को एक स्‍वाभाविक एवं परमावश्‍यक सत्‍य स्‍वीकार करता है।
संवाद:–‘नशा’ कहानी के संवाद बड़े चुटीले एवं अर्थ-गर्भित हैं। साधारण से साधारण पात्र भी सटीक संभाषण में तल्‍लीन दृष्टिगत होता है। यथा–ठाकुर ने फिर पूछा–तो खुशी से दे देगें। जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी ज़मीन छीननी ही पड़ेगी। हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं।
शब्‍दों में ठाकुर की लार सहज ही टपकती दिखाई पड़ती है। यहीं संवादों की सार्थकता है। संक्षिप्‍त होते हुए भी ये चुटीले हैं।
कहानी बीर के माध्‍यम से आत्‍म-कथ्‍य में लिखी गई है, इसलिए नायक का मनन एवं चिंतन व्‍यवहार एवं वास्‍तविकता उसके संवादों से ही टपकती है।
भाषा:–पात्रों के अनुकूल है। कहीं कहीं उर्दू के शब्‍दों का प्रयोग मिलता है, जो रियासत अली जैसे पात्र के मुंह में सटीक लगता है और कहीं-कहीं लेखक की अप्रत्‍यक्ष टिप्‍पणी से नि:सृत जान पड़ता है। गुस्‍से में आकर ईश्‍वरी अंग्रेजी के एक वाक्‍य का भी प्रयोग करता है–बीर को डांटने के लिए, उसे स्थिति की भयावहता से परिचित करवाने के लिए।
कहानी की शैली सपाट न होकर दृष्‍टांत की है। पहले से अमीर-गरीब की खाई का विचार लेखक के मन में है। इसी के प्रतिपादन के लिए स्थितियों का चयन किया गया है, जिसमें फंसकर नायक पुन: अपनी औकात को पहचानता है। शैली की रोचकता ने कहानी के तथ्‍य को बल प्रदान किया है।
प्रेमचंद की सभी क‍हानियां सोद्देश्‍य हैं। उनका उद्देश्‍य समाज की विसंगतियों को उखाड़कर आस्‍थावादी संदेश देना होता है। झूठ एवं छद्म के मोहपाश में फंसकर वास्‍तविकताओं को भूलना जीवन में त्रासद स्थितियों को उत्‍पन्‍न करता है। बीर अपने ही जाल में फंसता चला जाता है। पहले उसे संकोच होता था। एक गरीब क्‍लर्क का बेटा पैसे के बल पर किसी को नाच नहीं नचा सकता। परन्‍तु ईश्‍वरी के वैभव के कंधे पर चढ़कर उस पर नशा छाने लगा। नौकरों को ईश्‍वरी के अंदाज में डांटना उसे सुहावना लगा। रेलवे कैंटीन में खानसामों का उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखना बेहद बुरा लगा। ईश्‍वरी की संगत में उसकी भी इच्‍छा होती है कि उसके साथ रईसों सा व्‍यवहार हो परन्‍तु यह तो मिथ्‍या आकांक्षा थी। यही कारण है कि अन्‍त में वह गरीब बीर की आत्‍मा में लौट आता है। उसका नशा काफ़ूर हो जाता है।
लेखक ने सामाजिक वैषम्‍य पर प्रहार तो किया है परन्‍तु कहानी का चरम उत्‍कर्ष इस बात की ओर भी संकेत करता है कि इस खाई को पाटना इतना सहज एवं सरल नहीं। शताब्दियों से खड़ी हुई धनवान एवं निर्धन की दीवारें अभेद्य हैं। कभी सुराज के माध्‍यम से लेखक यह कहना चाहता है कि संभव है समान बंटवारे का समय आए। महात्‍मा गांधी का सपना साकार हो लेकि‍न अभी देश और काल की स्थितियां परिपक्‍व नहीं... उनमें परिवर्तन में अभी समय लगेगा।
इस प्रकार यह कहानी आदर्श की ओर अग्रसर होने के लिए लालायित होती हुई भी मोहभंग की कहानी बन गई। तंद्रा में बीर स्‍वप्‍न देखता रहा, क्षणभर के लिए ईश्‍वरी के घर में सुख-सुविधाएं भोगता रहा परंतु कब तक। वह मोहपाश से बाहर आते ही बिफर जाता है। यह निर्मम यथार्थ की सशक्‍त कहानी बन गई है... केवल कल्‍पना से ही कुछ प्राप्‍त नहीं होगा... अभी संघर्ष की यातना बाकी है। प्रेमचंद कहानी की चरम परिणति को प्रश्‍न चिह्न की स्थिति में लाकर खुला छोड़ देते हैं। इससे कहानी का अर्थ-गाम्‍भीर्य और भी बढ़ गया तथा यह कहानी कलात्‍मकता से परिपूर्ण हो गई है।

Saturday, 18 April 2020

मुंशी प्रेमचंद की कहानी “नशा”

मुंशी प्रेमचंद की कहानी “नशा”

मुंशी प्रेमचंद की कहानी “नशा” ईश्वरी एवं बीर नामक दो युवकों की कहानी है। ईश्वरी एक धनवान ज़मींदार का बेटा है, और बीर एक निर्धन क्लर्क का। बीर ज़मींदारों का तीव्र आलोचक है, उनके विलास को वह अनैतिक बताता है। इस विषय पर उसका अक्सर ईश्वरी से वाद-विवाद हो जाता है। यों तो ईश्वरी के मिजाज़ में ज़मींदारों के सारे तेवर हैं, पर बीर के प्रति उसका व्यवहार मित्रों वाला है। बीर द्वारा की गई ज़मींदारों की आलोचना पर भी वह कभी उत्तेजित नहीं होता।

एक बार छुट्टियों में ईश्वरी बीर को अपने साथ अपने घर ले जाता है। वह बीर का परिचय एक ऐसे धनवान ज़मींदार के रुप में कराता है जो कि महात्मा गांधी का भक्त होने के कारण धनवान होते हुए भी निर्धन का सा जीवन व्यतीत करता है। इस परिचय से बीर की धाक जम जाती है; लोग उसे ‘गांधीजी वाले कुंवर साहब’ के नाम से जानने लगते हैं। ईश्वरी के साथ-साथ बीर का भी भरपूर स्वागत सत्कार किया जाता है।

रहीम के शब्दों में,

जो रहीम ओछौं बढ़े, तो अति ही इतराए।
प्यादा जब फ़रज़ी भए, टेढ़ो-टेढ़ो जाए।।

ईश्वरी तो ज़मींदारी विलास का अभ्यस्थ था, पर बीर को यह सम्मान पहली बार मिल रहा होता है। यद्यपि वह जानता है कि ईश्वरी ने उसका झूठा परिचय कराया है, पर स्वागत सत्कार में अन्धा होकर वह अपना आपा खो बैठता है। उसे नशा हो जाता है। पहले जिन बातों के लिए वह ज़मींदारों की निन्दा किया करता था – जैसे नौकरों से अपने पैर दबवाना, नौकरों से सारे काम करवाना – अब वह स्वयं भी उन आदतों में लिप्त होने लगता है। ईश्वरी चाहे थोड़ा काम अपने आप कर भी ले, पर ‘गांधीजी वाले कुंवर साहब’ नौकरों का काम भला अपने हाथों से कैसे करते? नौकरों से ज़रा भी भूल हो जाती तो कुंवर साहब उनपर आगबबूले हो उठते।

झूठ-मूठ के कुंवर साहब का नशा टूटते देर नहीं लगती। ईश्वरी के घर से लौटते समय रेलगाड़ी खचाखच भरी हुई होती है। अब नए-नवेले कुंवर साहब को ऐसी असुविधा कैसे बर्दाश्त होती? क्रोध में आकर वह अपने पास बैठे एक यात्री की पिटाई कर देते हैं, जिससे पूरे डब्बे में हंगामा मच जाता है। खिजा हुआ ईश्वरी बीर को फटकार कर कहता है, “व्हाट ऐन ईडियट यू आर, बीर!”

मुंशी जी की यह कहानी मनोरंजक तो है ही, इसमें समाज एवं मानव व्यवहार की वास्तविकताओं का भी भरपूर चित्रण है। जिसके पास (धन, सत्ता, संसाधन, सुविधा) हैं, वह उनका उपभोग अवश्य करता है। जिसके पास यह नहीं है, वह इस उपभोग की निन्दा करता है, उसको अनैतिक बताता है। और अधिकतर वह निन्दा इसीलिए करता है क्योंकि उसको वह सुविधा उपलब्ध नहीं है। यदि किसी कारण से वह सुविधा उपलब्ध हो जाती है, तो बीर की तरह निन्दक भी उसके उपभोग में पीछे नहीं रहता। मैं पूछता हूँ हम में से किसके अन्दर एक बीर नहीं छुपा हुआ है?

नशा का एक पहलू और भी है। और वह है समाज के शीर्षकों तथा सम्मानों के सामने मनुष्य का अन्धापन। ‘गांधीजी वाले कुंवर साहब’ अपने नशे में एक गरीब आदमी को अपने पास नौकरी देने का आश्वासन दे देते हैं। खुशी में पागल वह आदमी उस रात को शराब पीता है, अपनी पत्नी को पीटता है, और महाजन से लड़ाई करता है। ऐसे ही जब बीर ईश्वरी से उसका असली परिचय न बताने का कारण पूछता है, तो ईश्वरी मुस्कुरा कर जवाब देता है, “इन गधों के सामने यह चाल ज़रूरी थी, वरना सीधे मुँह बोलते भी नहीं।”